लखनऊ (हैडलाइन ब्यूरो) उत्तर प्रदेश कैडर की 2013 बैच की चर्चित IAS अधिकारी दिव्या मित्तल ने करीब 13 वर्ष की सेवा के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। रविवार को सोशल मीडिया पर उनकी पोस्ट सामने आने के बाद
IAS अधिकारी दिव्या मित्तल के त्यागपत्र के बाद उत्तर प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। दिव्या मित्तल अपने कार्यकाल के दौरान विकास कार्यों और प्रशासनिक फैसलों को लेकर सुर्खियों में रही हैं।
फैसलों पर कायम रहने वाली अधिकारी
दिव्या मित्तल को मीरजापुर की जिलाधिकारी रहते हुए विशेष पहचान मिली। विकास योजनाओं को लेकर उनका रुख काफी सख्त माना जाता था। वह अधिकारियों को काम में लापरवाही पर फटकार लगाने के लिए भी जानी जाती थीं।
मीरजापुर में उनके कार्यकाल के दौरान लहुरिया दह गांव में पाइपलाइन के माध्यम से पानी की आपूर्ति शुरू हुई। आजादी के लगभग 76 साल बाद गांव के लोगों को पहली बार पाइपलाइन से पानी मिला। इससे पहले गांव के करीब 1,200 लोग पानी के लिए पास के झरने पर निर्भर थे। गर्मियों में झरना सूख जाने के कारण ग्रामीणों को काफी परेशानी होती थी।
री सार्वजनिक हुई। अपने संदेश में उन्होंने 13 वर्षों की सेवा यात्रा को अविस्मरणीय बताया और कहा कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस यात्रा को विराम दिया है।
लोगों के बीच भी बनाई अलग पहचान
दिव्या मित्तल प्रशासनिक कामकाज के साथ लोगों की मदद करने को लेकर भी चर्चा में रहीं। मीरजापुर से विदाई के दौरान उन्हें झूले पर बैठाकर फूलों की बारिश की गई थी। उनकी विदाई का यह अंदाज भी काफी चर्चित हुआ।
मीरजापुर के बाद उन्हें बस्ती के जिलाधिकारी की जिम्मेदारी मिली। वह यूपी के तीन जिलों संतकबीरनगर, मिर्जापुर और देवरिया में जिलाधिकारी के रूप में सेवाएं दे चुकी हैं।
लंदन की नौकरी छोड़कर लौटीं भारत
दिव्या मित्तल मूलरूप से हरियाणा के रेवाड़ी की रहने वाली हैं, जबकि उनका जन्म दिल्ली में हुआ। उनकी स्कूली शिक्षा दिल्ली में हुई। 10वीं और 12वीं के बाद उन्होंने दिल्ली में बीटेक किया। इसके बाद आईआईएम बेंगलुरु से एमबीए किया।
विवाह के बाद दिव्या मित्तल और उनके पति गगनदीप सिंह को लंदन में अच्छे पैकेज पर नौकरी मिली थी। हालांकि, दोनों ने वहां नौकरी छोड़कर भारत लौटने का फैसला किया। इसके बाद दिव्या UPSC की तैयारी में जुट गईं।
पहले IPS, फिर बनीं IAS
दिव्या मित्तल का चयन 2012 में IPS के लिए हुआ और उन्हें गुजरात कैडर मिला। IPS की ट्रेनिंग के दौरान भी उन्होंने IAS बनने का प्रयास जारी रखा। कड़ी मेहनत के बाद अगले ही वर्ष 2013 में उनका IAS के लिए चयन हो गया।
2013 बैच की IAS अधिकारी दिव्या मित्तल को 2015 में कंफर्मेशन मिला और मेरठ में ज्वाइंट मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त किया गया। वर्तमान में 42 वर्षीय दिव्या मित्तल के 13 वर्ष की सेवा के बाद इस्तीफे ने यूपी की प्रशासनिक व्यवस्था में चर्चा छेड़ दी है। उनकी अंतिम चिट्ठी में लोगों की सेवा से मिली संतुष्टि और अपने अनुभवों का जिक्र है, लेकिन त्यागपत्र के पीछे की वजह स्पष्ट नहीं की गई है।
पढ़िए क्या लिखा चिठ्ठी में
‘आज मैंने 13 वर्षों की अविस्मरणीय यात्रा को अपनी इच्छा से विराम देते हुए IAS से त्यागपत्र दे दिया है। साधारण परिवेश में पलते हुए मैंने एक अच्छे, सफल जीवन का सपना देखा था। दिन-रात एक कर IIT दिल्ली और IIM बैंगलोर से पढ़ने के बाद, लंदन में नौकरी लग गयी। पर ‘सब कुछ’ पा लेने पर भी कुछ अधूरा था। अपने देश में न होना खलता था। मेरी पढ़ाई, आत्मविश्वास, दुनिया में कहीं भी सिर उठाकर चलने की ताक़त, सब इस मिट्टी का कर्ज़ था मुझ पर। वो कर्ज़ चुकाना था। चाहती थी जिस भारत का सपना देखा था, उसे बनाने वाली ईंटों पर मेरे भी हाथों के निशान हों। सो लौट आई, और IAS अधिकारी बनने का सौभाग्य मिला। बहुत कुछ करने का मौका मिला और बहुत सीखा। देवरिया ने सिखाया कि सही के साथ खड़ा होना विकल्प नहीं, कर्तव्य है। मीरजापुर ने सिखाया कि ‘असंभव’ कोई तथ्य नहीं, बस एक राय है। और माँ विंध्यवासिनी के चरणों में बैठकर सीखा कि शक्ति किसी पद से नहीं, उनकी कृपा और लोगों के विश्वास से आती है। सबसे बड़ी सीख यह थी कि अपने लिए देखे सपने तो पूरे हो चुके थे, अब अपने लोगों के लिए देखे सपनों को जीना था। इस जीवन का असली सुकून उन आँखों में दिखा, जिस परिवार को पहली बार ज़मीन का हक़ मिला, जिस दिव्यांग को सम्मान से जीने का अवसर मिला, और जिस किसान के खेत को पानी मिला। उनके संघर्षों में साथ चलते हुए मैंने सीखा कि हर सरकारी फ़ाइल के पीछे एक व्यक्ति है, और उसकी गरिमा बनाये रखना ही न्याय है। मूर्ख थी जो सोचा था कि कुछ देने आयी हूँ। सच यह है कि सबसे ज़्यादा मैंने ही पाया, और वो कर्ज़ और भी बढ़ता गया। लोग मेरी ख़ुशी में मुझसे ज़्यादा ख़ुश हुए। उन्होंने मुझे तब भी उसी विश्वास से देखा, जब मैं खुद ही थकी या टूटी थी। और इसी ने आगे बढ़ते रहने की हिम्मत दी। इतना प्यार, इतना सम्मान, इतना अपनापन मिला, कि मेरी झोली पूरी भर गयी। और इसमें उन साथियों, अधिकारियों और कर्मचारियों का भी बहुत बड़ा श्रेय है जिन्होंने मेरे कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और साथ डटे रहे। आज आभार से आँखें नम हैं। बस एक दृश्य इनमें बसा है। लहुरिया दह की पहाड़ी की वो वृद्ध माँ, जो अपने गाँव में पहली बार पानी पहुँचता देख कुछ नहीं बोली, बस काँपते हाथों से मेरा सिर छूकर आशीर्वाद दे गई। पद तो आज छूट गया, पर वह स्पर्श जीवन भर नहीं छूटेगा। और वह सपना भी नहीं छूटेगा, जो देश की इस मिट्टी ने मुझे दिया है।’
आपकी अपनी,
दिव्या मित्तल


