👉🏻 पार्टी बदलने के कारण रिंकू के पुराने साथी भी हुए पराये, उप-चुनावों में भी हो सकता है भारी मतों का नुक्सान

👉🏻 पिछली हार से भी नहीं लिया कोई सबक, प्रॉपर्टी डीलरों, कॉलोनाइजरों और गलत लोगों के साथ से झेलना पड़ेगा नुकसान
👉🏻 पार्टी बदलने के कारण पुराने कार्यकर्ता और आम लोगों में रिंकू की छवि हुई खराब, पढ़ें पूरी खबर सिर्फ हैडलाइन एक्सप्रेस पर 👇🏻
जालंधर, 25 अप्रैल 2023-(प्रदीप भल्ला)-शहर में चर्चा है कि कांग्रेस पार्टी का हाथ छोड़कर आम आदमी पार्टी का झाड़ू थाम कर लोकसभा उपचुनाव में आप के उम्मीदवार बने सुशील कुमार रिंकू को इस बार भी भारी मतों से नुकसान झेलना पड़ सकता है। रिंकू द्वारा पार्टी बदलने के कारण रिंकू के पुराने साथी जो कि उस समय से रिंकू के साथ जुड़े हुए थे जब सुशील कुमार रिंकू पार्षद थे, लेकिन दल बदलने के कारण वही साथी अब रिंकू के विरोध में आ गए हैं। शहर में चर्चा है कि रिंकू को उपचुनाव में भारी मतों से नुकसान पहुंचाने के लिए पुराने साथियों और पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं ने कमर कस ली है। दूसरी तरफ पिछली बार की हार से भी रिंकू ने कोई खास सबक नहीं लिया है। वेस्ट क्षेत्र की जनता में चर्चा है कि हारने के बाद भी रिंकू फिर से प्रॉपर्टी डीलरों, कलोनाइजरो और गलत धंधा करने वाले लोगों को ही साथ लेकर चुनाव जीतने के लिए निकले हुए हैं। मगर दल बदलने के कारण पुराने कार्यकर्ता और आम जनता में रिंकू की छवि खराब हो चुकी है। लोकसभा का दायरा बहुत बड़ा होता है इसीलिए कितने ही इलाकों के लोगों को सुशील कुमार रिंकू के बारे में पता भी नहीं है। वही मुख्यमंत्री द्वारा चुनावों के समय अपने किए गए वादों को पूरा ना करना भी इस बार पार्टी को नुकसान पहुंचाएगा।
–व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर हो रहा रिंकू के विरोध में प्रचार–
सुशील कुमार रिंकू ने जैसे ही कांग्रेस पार्टी को छोड़कर आम आदमी पार्टी का दामन थामा उसी समय रिंकू के कितने ही समर्थक उनसे नाराज हो गए, क्योंकि मौजूदा विधायक और सुशील कुमार रिंकू का आपस में 36 का आंकड़ा था जिसका पता पूरे क्षेत्र को था। जैसे ही रिंकू ने अपने विरोधी से हाथ मिलाया तो उनके समर्थक नाराज हो गए और वह रिंकू के विरोध में आ गए। इसी कारण उन लोगों ने अब अपने-अपने मोबाइल में व्हाट्सएप ग्रुप बनाया है जो कि शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से जुड़ा हुआ है। उस ग्रुप के द्वारा ही रिंकू के विरोध में प्रचार किया जा रहा है। रोजाना ही उस ग्रुप के जरिए रिंकू के विरोध में मैसेज किए जाते हैं और कहा जाता है कि जो लोग भी इस ग्रुप में जुड़े हुए हैं वह आगे अपने परिचितों और रिश्तेदारों को यह समझाएं कि वह रिंकू को मतदान ना करें। इन सब बातों और शहर में हो रही चर्चाओं से पता चलता है कि पार्टी बदलना सुशील कुमार रिंकू के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।
–सत्ता का मौह एक साल के लिए भी नहीं त्याग पाए सुशील रिंकू–
रिंकू के ही खास साथी यह चर्चा कर रहे हैं कि वह एक साल भी सत्ता से दूर नहीं हो पाए। रिंकू में सत्ता का मौह इतना ज्यादा है कि वह कांग्रेस पार्टी को छोड़ आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए ताकि दोबारा से चुनावों में उम्मीदवार बनकर वह फिर से सत्ता का सुख भोग सकें। विधायक के चुनाव हारने के बाद तो रिंकू बड़ी-बड़ी बातें करते थे और जो लोग पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टियों में शामिल हो रहे थे उन लोगों को गद्दार तक कह रहे थे, लेकिन खुद अपनी बातों पर ही अडिग नहीं रह सके। मौका मिलते ही दल बदल गए और विरोध करने वालों से ही हाथ मिला बैठे। इन्हीं बातों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस उपचुनाव में जनता का रुख किस तरफ है।
