‘भेड़िया’ पिस्टल? हिटलर से लेकर चर्चिल तक हर कोई था इसका दीवाना

अगर आप हथियारों के शौक़ीन या जानकार हैं तो माउज़र से ज़रूर वाकिफ होंगे. थोड़ा और आगे बढ़कर अगर आप करीब से हथियारों का निरीक्षण करने में महारत रखते हैं तो माउज़र C96 पिस्तौल की बनावट आपको हैरत में डाल सकती है. पहली नज़र में ही इसकी बनावट की कलात्मक सुंदरता का पता चलता है जो आज की पिस्तौल में कम ही नज़र आती है. यह पिस्तौल अगर विरोधाभासों का पिटारा है. इसकी मैगज़ीन ट्रिगर के आगे लगती थी जबकि आम तौर पर सभी पिस्तौलों में मैगज़ीन ट्रिगर के पीछे बट के अंदर होती है.
माउज़र C96 मूल रूप से जर्मनी में बनी एक सेमी-ऑटोमैटिक पिस्टल है जिसका डिजाइन जर्मनी के दो माउज़र बन्धुओं ने सन् 1895 में तैयार किया था. इसके एक साल बाद जर्मनी की ही एक हथियार निर्माता कम्पनी माउज़र ने माउज़र सी-96 के नाम से इसे बनाना शुरू किया. 1937 तक इसका निर्माण जर्मनी में हुआ फिर 20वीं शताब्दी में इसकी नकल करके स्पेन और चीन में भी माउज़र पिस्तौलें बनाई गईं. पहले विश्वयुद्ध के दौरान इंग्लैंड की वेस्ले रिचर्ड कंपनी को माउज़र ने बड़े पैमाने पर यह पिस्टल सप्लाई की था. माउज़र कंपनी ने ऐसे तकरीबन 10 लाख पिस्टल बनाई थीं, जबकि स्पेन और चीन में बनी इसकी नकल की संख्या इससे कहीं ज़्यादा है, लेकिन सही तादाद के रिकॉर्ड मौजूद नहीं हैं.
टू इन वन किस्म का एक अनोखा हथियार
माउज़र का एक और मॉडल 1916 में बना जिसमें बट के साथ लकड़ी का बड़ा कुंदा अलग से जोड़कर किसी राइफल या बंदूक की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता था. इससे इसकी मारक क्षमता बढ़ोतरी हो जाती है. इस कुंदे को जब चाहे अलग करके छोटी पिस्तौल में तब्दील किया जा सकता है. इसकी दूसरी खासियत यह है कि इसके चैंबर में 6, 10 और 20 गोलियों की क्षमता वाली छोटी या बड़ी कोई भी मैगजीन फिट हो जाती है. इसके पीछे लगाया जाने वाला लकड़ी का कुंदा ही इसके खोल यानि होल्डर का काम भी करता है. इससे पहले 1896 में ही माउज़र कम्पनी ने C-96 का एक और मॉडल लॉन्च किया था जिसे ब्रूमहैण्डल कहा गया. ‘ब्रूमहैण्डल’ का डिजाइन तीन सगे भाइयों फिडेल, फ्रेड्रिच और जोसेफ फीड्रेल ने तैयार किया था. इसमें अलग होने वाला कुंदा लगाया जा सकता था.
एक किलोमीटर तक मारक क्षमता
वैसे तो माउज़र पिस्तौल की मारक क्षमता 150 से 200 मीटर तक होती है लेकिन अगर इसके बट में कुंदा लगा दिया जाए तो यह 1000 मीटर यानि एक किलोमीटर तक मार कर सकती है. इसकी नाल से छूटने वाली गोली का वेग 440 मीटर यानि 1450 फुट प्रति सेकंड होता है. इन तमाम खूबियों के चलते यह पिस्तौल बेहतरीन अस्त्र मानी जाती है. इसके कुंदे को पिस्तौल से अलग करने का विकल्प इसे अपने आप में टू इन वन किस्म का एक अनोखा हथियार बनाता है.
माउज़र के कारतूसों की विशेषता
माउज़र पिस्टल में 7.63×25 mm के कारतूसों का इस्तेमाल किया जाता है जबकि 0.32 बोर के रिवॉल्वर में 7.65×25 mm के कारतूस चलते हैं. इन दोनों में सिर्फ 0.02 mm का ही अंतर है इसलिए 0.32 बोर रिवॉल्वर के कारतूस भी माउज़र पिस्तौल में इस्तेमाल किये जा सकते हैं.
ग्रेटर नोएडा के किसान धर्मवीर सिंह को भी ये पिस्तौल बेहद पसंद है, वो बताते हैं कि मैंने 1994 में माउज़र C96 पिस्टल खरीदी थी, बहुत अच्छी और शानदार पिस्टल है. ये पिस्टल थोड़ी बड़ी है लेकिन मैं इसको बेल्ट में लगाकर रखता हूं, हम फॉर्म हाउस में रहते हैं. हमारे यहां धान और गेहूं की खेती होती है तो रात को भी सेफ्टी के लिए साथ रखकर सोता हूं. एक बार इसका हैमर टूट गया था जो मैंने दिल्ली में ही बनवाया था. मुझे आर्मरर ने बताया था कि इसमें इस तरह की दिक्कत कभी आती नहीं है आम तौर पर. 30 साल हो चुके हैं खरीदे हुए, इसको कभी-कभी चलाते हैं. जब से लिया है इस पिस्तौल में एक बार हैमर टूटने के अलावा कभी कोई और परेशानी नहीं आई है.
हिटलर से लेकर चर्चिल तक की पसंदीदा पिस्तौल
यह पिस्तौल ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल के अलावा जर्मन तानाशाह हिटलर की भी पसंदीदा रही. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर ने अपनी सेना के लिए बड़े पैमाने पर माउज़र C-96 पिस्तौल बनवाए थे, क्योंकि इसे रखना तो आसान है ही, साथ ही इसकी मारक क्षमता भी ज़्यादा है. 1896 में जब इसका उत्पादन शुरू हुआ और एक साल के अंदर ही इस पिस्तौल को सरकारी अधिकारियों के अलावा आम नागरिकों और सैन्य अधिकारियों को भी बेचा जाने लगा. माउज़र का सी-96 मॉडल ब्रिटिश अधिकारियों की भी पहली पसंद बन गया था. रूसी गृह युद्ध और बोलशेविक पार्टी की क्रांति में भी इन पिस्तौलों की मांग काफी रही थी.
अपने आप में बेजोड़ है माउज़र पिस्टल
दिल्ली के शमशुद्दीन गन हाउस के मोहम्मद शाहिद इस बेजोड़ पिस्टल के बारे में बताते हैं कि जैसे इंसान के शरीर में जोड़ होते हैं वैसे ही जोड़ इस पिस्तौल में भी हैं. माउज़र C-96 ऐसी पिस्टल है जिसकी बॉडी के पार्ट्स को जोड़ने के लिए कोई भी पेंच इस्तेमाल नहीं किया गया है. हिटलर ने बड़े पैमाने पर ये पिस्तौल अपनी सेना के लिए बनवाई थी क्योंकि इसे कैरी करना यानि ले जाना काफी आसान है. इसकी मैगज़ीन के चार्जर में 10 गोलियां आती हैं और ये क्षमता बढ़ाई भी जा सकती है. जर्मनी के सैनिक 50-60 चार्जर अपनी जेब में रख लिया करते थे और इस तरह युद्ध में 500-600 गोलियां लेकर पैराशूट से उतर जाते थे. चीन और स्पेन ने भी इसकी कॉपी बनाई उसमें वो बात नहीं है जो माउज़र के पिस्टल में है. पहले पाबंदी नहीं थी तो बहुत से लोग बाहर से ये पिस्टल लेकर आए, अब उसी समय के पिस्टल जो देश में उपलब्ध हैं वही खरीदे बेचे जाते हैं, कंडीशन के हिसाब से इनकी कीमत होती है.



