क्यों हाथ से फिसल जाती है बर्फ?

चिलचिलाती गर्मी में भी हर किसी को ठंडक का एहसास चाहिए. गर्मी से निजात पाने के लिए लोग ठंडी ड्रिंक्स पीते हैं. अगर आपको शेक बनाना है या कोई और ठंडी ड्रिंक बनानी है तो इसके लिए बर्फ की जरूरत पड़ती है. बर्फ के बिना गर्मी बिताना बहुत मुश्किल है. गांव-देहात में आज भी खुले में बर्फ बिकती है. शहरों में लोग पानी को सीधे रेफ्रिजरेटर में ठंडा करके पीते हैं. लेकिन जहां रेफ्रिजरेटर की सुविधा नहीं है, वहां लोग बर्फ खरीदकर पानी ठंडा करते हैं और फिर पीते हैं. इसलिए बर्फ की काफी अहमियत है.
क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि जब भी आप बर्फ हाथ में लेते हैं तो वह फिसलने लगती है. ये बात तो आपने जरूर नोटिस की होगी. बच्चों को बर्फ के साथ खेलने का काफी शौक होता है. जब बच्चे अपने हाथों में बर्फ के क्यूब्स लेते हैं तो उनके लिए बर्फ संभालना काफी मुश्किल होता है, क्योंकि ये तुरंत फिसलती है. क्या यह महज एक इत्तेफाक है या फिर सच में बर्फ के फिसलने के पीछे कोई ठोस वजह है?
बर्फ का बाहरी हिस्सा
बर्फ के फिसलने के पीछे कई बातें काम करती हैं. इन सबके पीछे साइंस अपना काम करती है. 160 से ज्यादा सालों से साइंटिस्ट्स बर्फ के बाहरी हिस्से पर बहस कर रहे हैं. बर्फ जमने का मतलब पानी का जमना होता है. ये जमा हुआ पानी मॉलिक्यूल्स की एक परत में लिपटा होता है जो लिक्विड की तरह व्यवहार करता है. एक नए एक्सपेरिमेंट में बर्फ की सतह की काफी चीजें सामने आई हैं, जिनसे इसके फिसलने का राज खुलता है.
बर्फ की ‘प्रीमेल्टिंग’ प्रोसेस
बर्फ की पिघली परत जीरो डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे के तापमान पर भी दिखाई देती है. बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया को “प्रीमेल्टिंग” के तौर पर जाना जाता है. यह परत एक ल्यूब्रिकेंट की तरह काम करती है, जो बताती है कि ठंडी कंडीशन में भी बर्फ फिसलन भरी क्यों होती है. लेकिन जब से 1850 के दशक में ब्रिटिश साइंटिस्ट माइकल फैराडे ने पहली बार बर्फ की लिक्विड जैसी कोटिंग के आइडिया पर विचार किया, तब से बर्फ की अनोखी सतह को कम ही समझा गया है.
बर्फ में दो प्रकार की सतह
नई स्टडी में साइंटिस्ट्स ने बर्फ की सतह पर एटम की लोकेशन को मापने के लिए एटॉमिक फोर्स माइक्रोस्कोप का इस्तेमाल किया. पेकिंग यूनिवर्सिटी के फिजिसिस्ट यिंग जियांग और उनके सहयोगियों ने हाल ही में अपनी स्टडी को नेचर में पब्लिश कराया है. इसके मुताबिक, -150 डिग्री सेल्सियस के आसपास तापमान पर बर्फ की सतह सिर्फ एक तरह की बर्फ से नहीं, बल्कि दो प्रकार की बर्फ से बनी होती है.
बर्फ के स्ट्रक्चर में खामी
बर्फ अपने मॉलिक्यूल्स की अरेंजमेंट के आधार पर अलग-अलग तरह की होती है. नॉर्मल कंडीशन में पानी के मॉलिक्यूल एक दूसरे के ऊपर रखे हेक्सागोन की परतों में मौजूद होते हैं. यह हेक्सागोनल बर्फ, जिसे ice Ih कहा जाता है, वो एक किस्म है जिसकी जियांग और उनके सहयोगियों ने स्टडी की है. लेकिन टीम ने पाया कि बर्फ की सतह पूरी तरह से हेक्सागोनल नहीं थी.
जर्मनी के मेनज में मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर पॉलिमर रिसर्च के कैमिस्ट युकी नागाटा कहते हैं कि मैं बहुत प्रभावित हुआ. यह पहचानना बहुत कठिन है कि मॉलिक्यूल कहां हैं, लेकिन मुझे लगता है कि वे इसे सफलतापूर्वक ढूंढ सकते हैं.
दो प्रकार की बर्फ के बीच के बॉर्डर पर रिसर्चर्स ने बर्फ के स्ट्रक्चर में खामी पाई है, जो दो पैटर्न के गलत एलाइनमेंट की वजह से हुई. जब रिसर्चर्स ने तापमान को कुछ डिग्री तक बढ़ा दिया, तो उन उलट-पुलट रीजन का विस्तार हुआ. लिक्विड चीजों में एटम और मॉलिक्यूल समान रूप से अरेंज होते हैं, और यही बात बर्फ की क्वासी-लिक्विड परत के लिए भी लागू होती है. टीम का तर्क है कि खामी का बढ़ना प्रीमेल्टिंग के शुरुआती फेज को दिखाता है.
बर्फ में समतल भी रहते हैं पानी के मॉलिक्यूल्स
जैसे-जैसे तापमान और बढ़ता गया, उन बॉर्डर में स्ट्रक्चर्स ने अव्यवस्था को और भी ज्यादा बढ़ा दिया. आम तौर पर, बर्फ झुर्रीदार परतों से बनी होती है. हरेक परत में पानी के कुछ मॉलिक्यूल नीचे होते हैं, और कुछ ऊंचे होते हैं. लेकिन टीम को ऐसी जगहें मिलीं जहां पानी के मॉलिक्यूल एक समतल यानी प्लेन में मौजूद थे. यह एक ऐसा स्ट्रक्चर है जो और भी ज्यादा अव्यवस्था के “बीज” के तौर पर काम करता है.
इससे भी ज्यादा तापमान पर टीम के कंप्यूटर सिमुलेशन से पता चलता है कि खामी बर्फ की पूरी सतह को कवर करने के लिए बढ़ने लगेगी, जिससे बर्फ पूरी तरह से पिघलकर लिक्विड जैसी हो जाएगी.
बर्फ की सतह के स्ट्रक्चर का पता लगाने के लिए इंडिविजुअल हाइड्रोजन एटम की लोकेशन को पहचानने और निशानदेही करने की काबिलियत का होना जरूरी है. यह एक ऐसा काम है जो एटॉमिक फोर्स माइक्रोस्कोप के साथ आम तौर पर चुनौतीपूर्ण होता है.
एक एटॉमिक फोर्स माइक्रोस्कोप इतनी पतली नोक से मैटेरियल की जांच करता है कि केवल एक मॉलिक्यूल या एटम आखिर में लटका रहता है. रिसर्चर्स ने नोक यानी टिप पर एक कार्बन मोनोऑक्साइड मॉलिक्यूल जोड़कर एक खास बदलाव को एड किया. उस टिप और बर्फ के पार स्कैन की गई सतह के बीच के फोर्स को मापकर टीम प्रोटॉन के स्थान का पता लगा सकती है.
कम तापमान में हुई स्टडी
यह स्टडी रोजमर्रा में बर्फ का जो तापमान रहता है उसकी तुलना में बहुत कम तापमान पर की गई है. लेकिन क्योंकि एक्सपेरिमेंट वैक्यूम में किया जाना चाहिए, इसलिए अगर तापमान बहुत ज्यादा बढ़ाते तो पानी के मॉलिक्यूल बर्फ से बाहर निकल आते. रिसर्चर्स को उम्मीद है कि बाल्मियर कंडीशन में माप हासिल करने के लिए बर्फ को हल्का गर्म करने के लिए छोटे लेजर पल्स का इस्तेमाल किया जाएगा.
बर्फ के अंदर ही स्ट्रक्चर अलग-अलग होते हैं, जिससे बर्फ में लिक्विडिटी बढ़ती है. बर्फ की ऊपरी परत में यह सबसे ज्यादा असर करती है, यानी बर्फ की ऊपरी परत पिघलकर पानी बनती रहती है. जब कोई इसे हाथ में लेता है, तो जैसे पानी फिसलता है, ऐसे ही बर्फ का बाहरी हिस्सा हाथ से फिसल जाता है. इसके अलावा हमारी बॉडी का टेंपरेचर ज्यादा होता है, जब बर्फ हमारी बॉडी के कॉन्टैक्ट में आती है तो पिघलना शुरू कर देती है.



