कैटरर मदन कैसे बन गया दाती महाराज?
राजस्थान में एक जिला है पाली. बांदी नदी के किनारे पर बसे पाली शहर को पालीवाल ब्राह्मणों ने बसाया था, इसलिए इसे पाली के नाम से जाना जाता है. इसे राजस्थान का औद्योदिक शहर भी कहा जाता है. इसी जिले के अलावास गांव में मेघवाल परिवार में 10 जुलाई 1950 को देवाराम के घर एक बच्चे का जन्म हुआ था. देवाराम और उनकी पत्नी ने बड़े प्यार से इस बच्चे का नाम रखा मदन. लेकिन जन्म के चार महीने के बाद ही मां का देहांत हो गया. मेघवाल समुदाय ढोलक बजाकर अपना परिवार पालता था. देवाराम भी यही करते थे. लेकिन उनका बेटा मदन जब सात साल का हुआ, देवाराम की भी मौत हो गई. इसके बाद बच्चे का असली संघर्ष शुरू हुआ.
नाम था मदन, बन गए दाती महाराज
गांव के ही किसी आदमी के साथ सात साल की उम्र में ही मदन देश की राजधानी दिल्ली में आ गया. यहां उसने पहले तो चाय की दुकानों में छोटे-मोटे काम किए, फिर धीरे-धीरे कैटरिंग का काम सीख लिया. इसके बाद मदन जन्मदिन और छोटी-मोटी पार्टियों के लिए कैटरिंग करने लगा. सिलसिला आगे बढ़ता रहा और मदन का कारोबार भी. लेकिन एक दिन मदन की मुलाकात राजस्थान के एक ज्योतिषि से हुई. वो साल 1996 था. मदन ने कैटरिंग का काम करने के साथ ही राजस्थान के उस बाबा से ज्योतिष विद्या भी सीख ली. ज्योतिष विद्या सीखने के बाद मदन ने कैटरिंग का कारोबार बंद कर दिया. इसे बेचकर मिले हुए पैसों से मदन ने कैलाश कॉलोनी में एक ज्योतिष केंद्र खोल दिया और अपना नाम बदलकर रख लिया दाती महाराज.
जिसने कहा कि शनि शत्रु नहीं मित्र है
हिंदू धर्म की कुछ मान्यताएं हैं. इन मान्यताओं में ग्रह दोष भी शामिल हैं. मान्यताओं के मुताबिक कुछ ग्रह जैसे मंगल, बुध और गुरु लाभदायक ग्रह हैं, वहीं शनि ग्रह लोगों को नुकसान पहुंचाता है. हिंदू धर्म की मान्यताओं में शनि की साढ़ेसाती सबसे ज्यादा नुकसानदायक मानी जाती है. दाती महाराज ने इन मान्यताओं का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया. जब हिंदू धर्म के लोग शनि की साढ़ेसाती के प्रभाव में आकर उससे बचने के उपाय खोज रहे थे, दाती महाराज ने एक नई थ्योरी दी और कहा कि शनि शत्रु नहीं मित्र है. उस वक्त तक दाती महाराज हिंदू धर्म के इकलौते ऐसे संत बन गए, जिन्होंने अब तक शत्रु माने जा रहे शनि को दोस्त करार दिया. इसके बाद से ही उनके अनुयायियों की संख्या में इजाफा होने लगा.
कांग्रेस नेता का हाथ देखा और वो बन गया विधायक
कैटरिंग का काम छोड़कर नए-नए ज्योतिषि बने दाती महाराज दो साल तक तो अपनी दुकानदारी चलाते रहे. 1998 में दिल्ली में विधानसभा के चुनाव होने थे. कांग्रेस से विधानसभा चुनाव लड़ने वाला एक नेता दाती महाराज के पास पहुंचा और अपनी कुंडली दिखाई. दाती ने उससे कहा कि इस चुनाव में तुम जीतकर विधानसभा में पहुंच जाओगे. जब चुनाव के नतीजे आए, तो कांग्रेसी नेता चुनाव जीत गया था. इसके बाद वो दाती महाराज से इतना प्रभावित हुआ कि उसने फतेहपुर बेरी में अपने पुस्तैनी मंदिर का काम दाती महाराज को सौंप दिया. दाती महाराज भी उस मंदिर का काम देखने लगे. और धीरे-धीरे करके उस मंदिर के साथ ही उसकी आस-पास की जगहों पर भी कब्जा जमा लिया. आज की तारीख में वो जमीन करीब सात एकड़ है, जिसमें दाती महाराज का आश्रम फैला हुआ है.
अखाड़े ने बना दिया महामंडलेश्वर
2010 में जब हरिद्वार में महाकुंभ लगा तो श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़े ने दाती महराज को महामंडलेश्वर की उपाधि दी थी. उसके बाद से ही दाती महाराज हो गए श्री सिद्ध शक्ति पीठ शनिधाम पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर परमहंस दाती जी महाराज. इस नाम को छोटा करें तो वो लिखते हैं परमहंस दाती जी महाराज. महामंडलेश्वर की उपाधि मिलने के बाद दाती जी महाराज महानिर्वाणी अखाड़े के मंचों पर जाने लगे और साथ ही देश में होने वाली धर्म संसदों में भी शामिल होने लगे. महामंडलेश्वर बनने के बाद से ही दाती महाराज हरिद्वार और इलाहाबाद में भी अपने आश्रम खोलने की तैयारी में लगे हुए थे.
देखते ही देखते बन गए सेलिब्रेटी
फतेहपुर बेरी में कांग्रेस के नेता के मंदिर से अपने साम्राज्य की शुरुआत करने वाले दाती महाराज ने 22 साल के अंदर ही देश के कुछ चुनिंदा बाबाओं की लिस्ट में खुद को शुमार कर लिया. उन्होंने टीवी चैनलों पर शनि शत्रु नहीं मित्र है के नाम से कई कार्यक्रम शुरू किए. इसके अलावा बतौर ज्योतिषि भी वो चैनलों पर आने लगे. इसके बाद उनका साम्राज्य बढ़ता ही गया. उन्होंने खुद का यू-ट्यूब चैनल Gurumantra With Daati Maharaj शुरू कर दिया, जिसपर शनि से संबंधित प्रवचन हैं. इसके अलावा दाती महाराज ने अपना फेसबुक पेज भी बना लिया, जिसपर 34 लाख से भी अधिक फॉलोवर हैं.
कई राज्यों में बना है आश्रम
पाली से दिल्ली आने के बाद दाती महाराज ने पहला आश्रम फतेपुर बेरी में बनाया. 2003 में इस आश्रम में शनि देव की एक प्रतिमा स्थापित की गई, जो भारत में अब तक की शनि देव की सबसे बड़ी प्रतिमा है. इस आश्रम में अस्पताल, गोशाला और अनाथालय भी हैं. इसके बाद दाती महाराज ने पाली में भी अपना एक आश्रम बनाया. उनका ये आश्रम उनके पुस्तैनी गांव अलावास में है, जिसका नाम आाश्वासन बाल ग्राम है. इस आश्रम में अस्पताल गोशालाएं और अनाथालय भी है. इस आश्रम की शुरुआत के दौरान दाती महाराज ने अपने माता-पिता के मरने का जिक्र करते हुए कहा था कि सात साल की उम्र में ही मां-बाप से बिछड़कर मैं अनाथ हो गया. कोई और अनाथ की तरह जिंदगी न जिए, इसके लिए उन्होंने पाली में अनाथालय शुरू किया. आश्रम की वेबसाइट के मुताबिक फिलहाल उस आश्रम में 800 अनाथ बच्चे रहते हैं. स्थानीय लोगों के मुताबिक इस आश्रम में आने वाले बच्चे की पढ़ाई-लिखाई से लेकर शादी-विवाह तक का खर्च दाती महाराज ही उठाते हैं. इसके अलावा उत्तराखंड में दाती महाराज के कई आश्रम हैं. इन सबको चलाने के लिए एक शनिधाम ट्रस्ट बना है, जिसके मुखिया दाती महाराज ही हैं.
सारी अच्छाइयों पर भारी पड़ गई एक बुराई
