*👉🏻 गन हाउस वाले कंट्रोल रेट से ज्यादा दाम पर बेच रहे हैं गोलियां* *👉🏻 अपराधियों तक पहुंचती हैं ब्लैक में बिकी गोलियां* *👉🏻 पढ़ें पूरी खबर सिर्फ हैडलाइन एक्सप्रेस पर 👇🏻*



जालंधर, 20 नवंबर 2020-(एच.ई)-अपराधियों को गोलियां सप्लाई आखिर करता है कौन …? यह तो लगभग तय ही लगता है कि अपराधियों को गोलियां सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त कुछ डीलरों द्वारा ही सप्लाई की जाती है! मोटी कमाई के चक्कर में कुछ आर्म्स लाइसेंस डीलर ही अपराधियों को विभिन्न बोर की गोलियां सप्लाई करते है! प्रसाशन द्वारा लाइसेंस धारक आर्म्स होल्डर सिविलियन को लाइसेंस पर 25/50 गोलियां खरीदने का अधिकार मिलता है,
यानि लाइसेंस होल्डर सिविलियन का जब आर्म्स लाइसेंस बनता है तो वह अपने आर्म्स के साथ लाइसेंस पर पहली बार 25 गोलियाँ ही खरीद सकता है। इंडियन ऑर्डिनेश फैक्ट्री बोर्ड के अधीन महाराष्ट्र के पूना के खड़की स्थित केएफ कंपनी की .32 बोर पिस्टल की गोली का सरकारी रेट 18% टेक्स लगा कर करीब 80 रुपए का मिलता है, जबकि .32 बोर रिवॉल्वर की गोली 18% टेक्स देने के बाद 60 रुपए का पड़ता है।
इसी तरह .22 बोर रिवाल्वर और राइफल की गोली का 25 से 30 रुपए सरकारी रेट निर्धारित किया गया है। 315 बोर राइफल और 12 बोर बंदूक की गोलियां भी 60 से 70 रुपए टेक्स सहित सिविलियन आर्म्स लाइसेंस होल्डर को मिलना चाहिये पर आर्म्स लाइसेंस डीलर यही गोलियों को आर्म्स लाइसेंस पर सिविलियन को 100 से 125 रुपए में बेचते है, जबकि डीलर ब्लैक मार्किट (दो नंबर में) में यही गोलियां 250 से 400 रुपए तक बेच रहे है। पिस्टल और रिवाल्वर की गोलियां 20 की पैकिंग में गत्ते के डिब्बी में आती है और इनकी एक्सपाइरी 5 से 6 साल डिब्बी पर लिखी होती है। आर्म्स लाइसेंस डीलर बड़ी होशियारी से इन गोलियों की डिब्बियों पर अंकित हुए मूल्य को या तो ब्लैक इंक से ढ़क देते है या फिर प्रिंट वाली जगह से मूल्य प्रिंट ही उड़ा देते है। ये सब डीलर इस लिए करते हैं ताकि ग्राहक को सरकार द्वारा निर्धारित किये गए मूल्य का पता न चल सके और डीलर अपने मनचाहे मूल्य पर गोलियां बेच सके। अपराधी किस्म के व्यक्ति या असले की नुमाइश करने वाले युवक (जो शादी या पार्टियों में गोलियां चलाते हैं) डीलरों से दो नंबर में गोलियां महंगे दाम पर खरीद लेते हैं। मोटी कमाई के चक्कर में डीलर गोलियां दो नम्बर में बेच देते हैं। यहीं दो नंबर में बेची हुई गोली ही किसी की जान की दुश्मन बनती है। एक गन हाउस डीलर ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि 80 प्रतिशत आर्म्स लाइसेंस डीलर ब्लैक में गोलियां बेच कर ही रुपए कमा रहे है। उस डीलर ने यह भी बताया कि प्रशासनिक अधिकारियों की तरफ से डीलरों की दुकान पर गहराई से जांच ही नहीं होती ताकि वह पकड़े जा सके। उस डीलर ने कहा कि महंगे दाम पर बेची हुई गोलियां ही अपराधियों के पास पहुंचती है क्योंकि .32 बोर पिस्टल/रिवाल्वर, 315 बोर राइफल और 12 बोर बंदूक की गोलियां सिर्फ आर्म्स लाइसेंस डीलरों को ही सप्लाई होती है। 315 बोर और 12 बोर बंदूक की गोलियों को अपराधी देसी कट्टा में इस्तेमाल करते है। एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि अगर आर्म्स लाइसेंस डीलर अपराधियों को गोलियां न बेचे तो अपराध पर लगाम खुद व खुद लग जायेगी और बेगुनाहों की जिंदगी बचाई जा सकती है। पुलिस को भी चाहिए कि अगर अपराध पर अंकुश लगाना है तो अवैध बिक रही गोलियों के कारोबार पर अंकुश लगाया जाए।
