*👉🏻 पंजाब के ज्यादातर सरकारी स्कूलों में कोविड-19 गाइडलाइन की नहीं होती पालना, विद्यार्थियों की सुरक्षा राम भरोसे* *👉🏻 स्कूली विद्यार्थियों के कोरोना संक्रमित होने से अभिभावकों में पैदा हुआ डर* *👉🏻 पढ़ें पूरी खबर सिर्फ हैडलाइन एक्सप्रेस पर 👇🏻*
जालंधर, 06 मार्च 2021-(एच.ई)-पंजाब सरकार द्वारा सभी शिक्षण संस्थानों को खोलने का फैसला अब भारी पड़ता दिखाई दे रहा है। रोजाना ही पंजाब के अलग-अलग शहरों से कोरोना संक्रमित मरीजों की गिनती बढ़ती दिखाई दे रही है। संक्रमित मरीजों में ज्यादातर सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी ही है। अब अगर बात की जाए विद्यार्थियों के कोरोना पॉजिटिव आने की तो ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि पंजाब के ज्यादातर सरकारी स्कूलों में कोविड-19 गाइडलाइन की पालना ही नहीं हो रही।
देहात क्षेत्र में स्थित सरकारी स्कूलों में मास्क और सेनीटाइजर नाम की वस्तु दिखाई ही नहीं देती। ज्यादातर सरकारी स्कूलों के प्रिंसिपल और अध्यापक खुद ही मास्क और सैनिटाइजर का इस्तेमाल नहीं करते तो वह बच्चों को कैसे इन चीजों का इस्तेमाल करने के लिए कह सकते हैं। पंजाब के ज्यादातर सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी बिना मास्क पहने ही स्कूल आते हैं और प्रिंसिपल, हेडमिस्ट्रेस व अध्यापक उन्हें नियमों का पालन करने के लिए भी नहीं कहते। जिसका नतीजा है कि कोरोना मरीजों की संख्या रोजाना बढ़ने लगी है और कोरोना की चपेट में आने वालों में ज्यादातर संख्या स्कूली विद्यार्थियों की है। नाम ना छापने की शर्त पर अभिभावकों ने कहा है कि सरकार ने रुपयों की खनक को देखते हुए बच्चों की जान को जोखिम में डाल दिया है और शिक्षण संस्थानों को खोल दिया है। सभी स्कूल फीसें तो ले ही रहे थे तो बच्चों की ऑनलाइन स्टडी भी जारी रखनी चाहिए थी लेकिन कुछ विद्यार्थियों द्वारा स्कूल फीसें ना भरने के कारण स्कूलों ने दबाव बनाना शुरू कर दिया और बच्चों को स्कूल बुलाने लगे। स्कूलों ने फीसें तो ली मगर बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने से इंकार कर दिया।
स्कूलों ने बच्चों के मां-बाप को स्वयं घोषणा पत्र देने के लिए कहा था। जिसमें लिखा गया था कि अगर कोरोना के इस दौर में उनके बच्चे को स्कूल में कोई बीमारी होती है या उसकी जान ही चली जाती है तो उसका जिम्मेदार स्कूल प्रशासन नहीं होगा। ज़्यादातर अभिभावकों ने इसको घोषणा पत्र में मंजूरी नहीं दी थी। फिर भी स्कूलों ने बिना लिखित लिए ही बच्चों को स्कूल में बुलाना शुरू कर दिया। अब अगर स्कूलों की जांच की जाए और उनसे स्वंय घोषणा पत्र मांगे जाए जो अभिभावकों ने लिखित में दिए हैं या नहीं दिए हैं तो स्कूल प्रबंधकों की पोल खुल सकती है। ज्यादातर सरकारी स्कूलों में मां-बाप द्वारा लिखित आदेश है ही नहीं। फिर भी स्कूल दबाव बनाकर बच्चों को स्कूल आने के लिए मजबूर कर रहे है। जिसका नतीजा आज सामने आ रहा है। पंजाब सरकार को चाहिए कि वह स्कूलों में अपनी टीमें भेजकर चेक करवाएं कि उनमें कोविड-19 गाइडलाइन की पालना हो रही है या नहीं। चेकिंग भी गुप्त तरीके से होनी चाहिए क्योंकि सरकारी स्कूलों में अगर डीईओ ने ही जाना हो तो पहले ही शोर मच जाता है कि आज इस स्कूल में इंस्पेक्शन टीम आने वाली है। शोर मचने के कारण ही उस दिन स्कूल प्रबंधन सभी इंतजाम पूरे कर लेता है। अगर स्कूलों की पोल खोलनी है तो सरकार को खुफिया टीमें बनाकर सरकारी स्कूलों में भेजनी होगी ताकि पता चल सके कि स्कूल किस प्रकार बच्चों की जिंदगी को जोखिम में डाल रहा है।
–स्कूलों में ना हो रहे हैं कोरोना टेस्ट और ना ही लग रही है टीचर्स को वैक्सीन की डोज–
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ज्यादातर सरकारी स्कूलों में सेहत विभाग द्वारा बच्चों के कोरोना टेस्ट बंद कर दिए हैं और ना ही टीचर्स को वैक्सीन की डोज लगाई गई है। सेहत विभाग द्वारा ज्यादातर सरकारी स्कूलों में टीचर्स से कोरोना वैक्सीन लगवाने संबंधी जानकारी तो ली गई थी लेकिन महीने से ऊपर बीत जाने के बाद भी टीचर्स को वैक्सीन की पहली डोज़ नहीं दी गई। इस बात से ही पता चलता है कि सेहत विभाग की कार्यप्रणाली भी कछुए की चाल चल रही है। दूसरी तरफ सेहत विभाग ने ज्यादातर सरकारी स्कूलों में बच्चों की कोरोना टेस्टिंग इसलिए बंद कर दी है क्योंकि उनमें से ज्यादातर विद्यार्थी कोरोना पॉजिटिव आ रहे हैं। विद्यार्थियों में कोरोना फैलने से प्रशासन के कोविड-19 गाइडलाइन संबंधी कितनी सतर्कता है उसकी पोल ना खुल जाए, इसी कारण सेहत विभाग ने ज्यादातर सरकारी स्कूलों में टेस्टिंग ही बंद कर दी है। अभिभावकों का कहना है कि अगर सरकार कोरोनावायरस को फैलने से रोक पाने में सतर्क नहीं थी तो उसने शिक्षण संस्थान खोलने के आदेश ही क्यों दिए। अब बच्चों की जान खतरे में पड़ गई है तो इसका जिम्मेदार कौन है।
